कोरोना से लड़ाई : आखिर किससे उम्मीद रखें कोरोना वॉरियर्स

पत्रलेखा चटर्जी

कोरोना वायरस की महामारी से अब भी दुनिया भर के अनेक देश जूझ रहे हैं, ऐसे में अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ता अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं, ताकि अन्य लोगों का जीवन बचाया जा सके। उनके इस साहस और धैर्य को काफी सराहा भी गया है। लेकिन क्या सिर्फ उनकी सराहना करना ही काफी है? जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा हाल ही में आयोजित एक वेबिनार ने इन नायक/नायिकों से जुड़े कठोर सत्य की ओर ध्यान खींचा है। यह वेबिनार इस विषय पर केंद्रित था, अग्रिम मोर्चे पर सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का संघर्षः आवश्यक लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त। इसमें भारत, मलावी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपींस और कोलंबिया जैसे एक दूसरे से एकदम जुदा और विविधता वाले देशों के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सुनने का मौका मिला। इससे एहसास हुआ कि कोरोना महामारी के कारण उन्हें सांकेतिक तौर पर मान्यता जरूर मिली और उनके ‘नायकत्व’ को सरकारों, मीडिया और अन्य लोगों ने अक्सर सार्वजनिक तौर पर सराहा भी कि कैसे अग्रिम पंक्ति के इन कार्यकर्ताओं ने जोखिम उठाकर स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक सेवाएं मुहैया कराई हैं, लेकिन उन्हें कोविड-19 के कारण काम के जिस भारी बोझ और जिन बेहद कठिन परिस्थितियों में अपेक्षाकृत कम वेतन के साथ काम करना पड़ता है, उसकी ओर ध्यान कम ही गया है।

वेबिनार में विभिन्न देशों के सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने जो प्रेजेंटेशन दिए, उनके विषय और मुद्दे काफी हद तक मिलते-जुलते थे कि कैसे स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़े उनके काम में बदलाव आया, कैसे कार्य करने की उनकी परिस्थितियां प्रभावित हुई हैं और कैसे खुद उनका जीवन इन सबसे प्रभावित हुआ है। और यह भी कि वे बेहतर रोजगार परिस्थितियां हासिल करने के लिए कैसी रणनीतियां काम में ला रहे हैं। इन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने कुछ बेहद कठोर सच्चाइयों से भी रूबरू कराया। समुदायों को कोविड-19 को लेकर जागरूक करने के लिए ये स्वास्थ्य कार्यकर्ता अग्रिम मोर्चे पर तैनात होते हैं और लोगों को समझाते हैं कि उन्हें कैसे महामारी से बचाव करना चाहिए और वैक्सीन क्यों सुरक्षित है। सरकारों ने और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने महामारी की शुरुआत के समय से इन अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को नायक/नायिका जैसी उपमाओं से नवाजा है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी स्थिति सचमुच बेहद खराब है।

कोविड-19 महामारी के दौरान उनकी काम करने की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है। उनकी सेवाओं की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता होने के बावजूद, उनके अनुबंध अनौपचारिक या अल्पकालिक रहते हैं, उनके पास आम तौर पर नियोक्ता द्वारा प्रदान किए गए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण तक की पहुंच नहीं होती है, और उन्हें कम और अनियमित वेतन पर काम करने को मजबूर होना पड़ता है। कम वेतन और असुरक्षित रोजगार के साथ ‘आवश्यक सेवाओं’ से जुड़े अन्य कर्मचारियों/कार्यकर्ताओं की तरह सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को बाल सुरक्षा सेवाओं के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। मसलन, लॉकडाउन के दौरान ‘आवश्यक सेवाओं’ में होने के कारण उन्हें तो काम पर जाना पड़ा, मगर स्कूल बंद होने के कारण उनके बच्चे घर पर रहे और इस दौरान वे उन पर ठीक से ध्यान नहीं दे सके।

आशा वर्कर यूनियन, हरियाणा की महासचिव सुरेखा ने भारत के अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की तकलीफों को मुखरता से सामने रखा। उन्होंने बताया कि कैसे कोविड-19 ने आशा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की चुनौतियां बढ़ा दीं। यह भी सच है कि कोविड-19 की महामारी के कारण आशा कार्यकर्ताओं की ओर लोगों का ध्यान गया है। महामारी से लड़ाई में आशा कार्यकर्ता जमीनी सैनिक की तरह हैं और वे डाटा एकत्र करने से लेकर संक्रमित लोगों की देखभाल तक कर रही हैं। ध्यान रहे, उन्हें यह सब अपनी नियमित जिम्मेदारी के साथ करना पड़ रहा है।

इसके बावजूद उन्हें अब भी ‘कार्यकर्ता’ के रूप में ही वर्गीकृत किया गया है और अधिक काम के बावजूद उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारियों जैसी न तो मान्यता मिली है और न ही उससे जुड़े लाभ। स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं के रूप में उन्हें न्यूनतम पारिश्रमिक भी नहीं मिलता। अपने देश में कोविड के कारण मरने वाले अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं का अधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हालांकि अखबारों और अन्य मीडिया में कोविड-19 से मरने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की खबरें जरूर प्रकाशित/प्रसारित हुई हैं। कई राज्यों में ऐसे मृतकों के परिजनों को किसी तरह का मुआवजा नहीं मिला है, बावजूद इसके कि वे इसके हकदार हैं।

सुरेखा ने मुझे बाद में बताया कि महामारी के समय अतिरिक्त काम करने के एवज में हरियाणा में आशा कार्यकर्ताओं को सिर्फ एक हजार रुपये अतिरिक्त दिए गए। आशा कार्यकर्ताओं की स्थितियों पर बात करते हुए वह भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि महामारी की पहली लहर के समय जब उन्हें संक्रमण से बचाव के लिए सरकारी तौर पर कोई उपकरण या मास्क नहीं मिला, तो कैसे उन्होंने पुरानी साड़ियों के कपड़े से मास्क तैयार किए। यही नहीं, संक्रमण की शृंखला का पता लगाने के लिए जब वे लोगों के पास जाती थीं, तो उन्हें भारी विरोध और कई बार हिंसा तक का सामना करना पड़ा।

अगस्त, 2020 में छह लाख से अधिक आशा कार्यकर्ताओं ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ वेतन वृद्धि, समय पर वेतन, बेहतर सुरक्षा उपकरणों तक पहुंच, बीमा, परिवहन भत्ता, नियमित जांच और कानूनी मान्यता, ताकि उन्हें सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले लाभ मिल सकें, को लेकर हड़ताल की थी। महामारी के पहले से उनकी मांग है कि उन्हें मानदेय पर काम करने वाले स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं के बजाय सरकार के औपचारिक कर्मचारियों के रूप में मान्यता दी जाए। ऐसे समय जब, महामारी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, जमीनी स्तर पर इन अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की जरूरत समझी जा सकता है। उनकी बुनियादी आवश्यकताओं के बारे में विचार करने का यही ठीक समय है।

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